‎पद नहीं, पकड़ पर फोकस: निशांत कुमार की धीमी लेकिन मजबूत सियासी चाल

बिहार की सत्ता के गलियारों में जिस फैसले को लगभग तय माना जा रहा था, उसने आखिरी वक्त में सबको चौंका दिया। नई सरकार के गठन के बीच एक ऐसा नाम, जिसे सत्ता के केंद्र में देखा जा रहा था, उसने खुद ही पीछे...

‎पद नहीं, पकड़ पर फोकस: निशांत कुमार की धीमी लेकिन मजबूत सियासी चाल

बिहार की सत्ता के गलियारों में जिस फैसले को लगभग तय माना जा रहा था, उसने आखिरी वक्त में सबको चौंका दिया। नई सरकार के गठन के बीच एक ऐसा नाम, जिसे सत्ता के केंद्र में देखा जा रहा था, उसने खुद ही पीछे हटकर राजनीतिक हलकों में नई चर्चा छेड़ दी। दरअसल, नई सरकार के गठन के साथ यह कयास लगाए जा रहे थे कि निशांत कुमार को बड़ी जिम्मेदारी सौंपी जाएगी। यहां तक कि उन्हें उपमुख्यमंत्री पद के लिए भी मजबूत दावेदार माना जा रहा था लेकिन अंतिम क्षणों में उन्होंने इस भूमिका से खुद को अलग कर लिया।

सम्राट चौधरी की कैबिनेट में निशांत कुमार की एंट्री लगभग तय ...

राजनीतिक चर्चाओं के अनुसार, सम्राट चौधरी की कैबिनेट में निशांत कुमार की एंट्री लगभग तय मानी जा रही थी हालांकि, अचानक हुए बदलाव में विजय चौधरी, बिजेंद्र यादव को उपमुख्यमंत्री बनाया गया। बता दें कि हाल के दिनों में राजनीति में निशांत कुमार की सक्रियता जरूर बढ़ी है। वे पार्टी कार्यक्रमों और सार्वजनिक आयोजनों में लगातार नजर आ रहे हैं। इससे यह संकेत मिल रहा है कि वे संगठन और जनता के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। सूत्रों की मानें तो पार्टी नेतृत्व चाहता है कि निशांत कुमार सक्रिय राजनीति में तेजी से आगे बढ़ें और सरकार में अहम भूमिका निभाएं लेकिन उनका खुद का रुख थोड़ा अलग दिखाई दे रहा है। वे किसी बड़े पद को जल्दबाजी में स्वीकार करने के बजाय, धीरे-धीरे अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करना चाहते हैं।

निशांत ने 8 मार्च को जदयू की सदस्यता ली थी

निशांत कुमार का यह फैसला यह दर्शाता है कि वे जल्दबाजी में सत्ता की राजनीति में कदम रखने के इच्छुक नहीं हैं। अब नजर इस बात पर रहेगी कि वे किस तरह अपनी राजनीतिक पहचान बनाते हैं और आने वाले समय में बिहार की राजनीति में अपनी भूमिका तय करते हैं। सूत्रों के हवाले से निशांत का मानना है कि जनता के बीच से चुनकर आना और अपनी मेहनत से पहचान बनाना ज्यादा जरूरी है। फिलहाल साफ है कि निशांत का डिप्टी सीएम पद ठुकराना कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं, बल्कि एक लंबी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है। वे जल्दबाजी में सत्ता नहीं, बल्कि मजबूत राजनीतिक आधार बनाकर आगे बढ़ना चाहते हैं। आने वाले समय में पार्टी संगठन में उन्हें बड़ी जिम्मेदारी मिल सकती है, जिसके बाद उनकी भूमिका और भी अहम हो जाएगी।

 जानकारी के लिए बता दें कि निशांत ने 8 मार्च को जदयू की सदस्यता ली थी। उसी समय से कयास लगने लगे थे कि वे सरकार में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं. जब नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद छोड़कर राज्यसभा जाने का फैसला किया, तब पार्टी के कई विधायक और सांसद चाहते थे कि निशांत को डिप्टी सीएम या यहां तक कि मुख्यमंत्री बनाया जाए।