बिहार के इंजीनियरिंग कॉलेजों को बड़ा झटका: एक भी सरकारी या निजी संस्थान को नहीं मिली एनबीए मान्यता, दांव पर छात्रों का कॅरियर

बिहार में उच्च शिक्षा को ग्लोबल स्टैंडर्ड पर ले जाने के दावों को एक बड़ा झटका लगा है। सूबे का एक भी सरकारी या निजी इंजीनियरिंग कॉलेज अब तक नेशनल बोर्ड ऑफ एक्रिडिटेशन (एनबीए) की मान्यता हासिल नहीं कर सका है। तकनीकी शिक्षा की गुणवत्ता को प्रमाणित करने वाली इस सर्वोच्च संस्था से सर्टिफिकेट न मिलना राज्य के तकनीकी शिक्षा तंत्र की सबसे कमजोर कड़ी बनकर उभरा है।

बिहार के इंजीनियरिंग कॉलेजों को बड़ा झटका: एक भी सरकारी या निजी संस्थान को नहीं मिली एनबीए मान्यता, दांव पर छात्रों का कॅरियर

DESWA DESK : बिहार में उच्च शिक्षा को ग्लोबल स्टैंडर्ड पर ले जाने के दावों को एक बड़ा झटका लगा है। सूबे का एक भी सरकारी या निजी इंजीनियरिंग कॉलेज अब तक नेशनल बोर्ड ऑफ एक्रिडिटेशन (एनबीए) की मान्यता हासिल नहीं कर सका है। तकनीकी शिक्षा की गुणवत्ता को प्रमाणित करने वाली इस सर्वोच्च संस्था से सर्टिफिकेट न मिलना राज्य के तकनीकी शिक्षा तंत्र की सबसे कमजोर कड़ी बनकर उभरा है। इसका सीधा और घातक असर यहां पढ़ रहे हजारों छात्रों के प्लेसमेंट, उनके भविष्य और खुद संस्थानों की राष्ट्रीय साख पर पड़ रहा है।

क्या है एनबीएऔर क्यों है यह बेहद जरूरी?

नेशनल बोर्ड ऑफ एक्रिडिटेशन (एनबीए) अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआईसीटीई) के तहत एक स्वायत्त निकाय है। यह देश के तकनीकी पाठ्यक्रमों (इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट, फार्मेसी आदि) की गुणवत्ता, इंफ्रास्ट्रक्चर, फैकल्टी के स्तर और रिसर्च वर्क को परखकर मान्यता देता है। आसान शब्दों में कहें तो एनबीए मान्यता इस बात की गारंटी होती है कि उस कॉलेज से पास आउट होने वाला इंजीनियर वैश्विक मानकों पर खरा उतरता है।

साख पर बट्टा: छात्रों के कॅरियर पर ट्रिपल अटैक

इस मान्यता के अभाव में बिहार के छात्र राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तीन बड़े मोर्चों पर पिछड़ रहे है। दरअसल, टाटा (टीसीएस), इन्फोसिस, विप्रो जैसी देश की अग्रणी टेक कंपनियां और कई मल्टीनेशनल कॉर्पोरेशन्स अब सिर्फ उन्हीं कॉलेजों में कैंपस प्लेसमेंट के लिए जाती हैं, जिनके पास एनबीए मान्यता होती है। मान्यता न होने से बिहार के मेधावी छात्रों को ऑफ-कैंपस (बाहर जाकर) धक्के खाने पड़ रहे हैं।


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इसके तहत, अगर कोई छात्र एनबीए मान्यता प्राप्त कोर्स से पास आउट है, तो उसकी डिग्री को अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा सहित दुनिया के 20 से अधिक देशों में सीधी मान्यता मिलती है। बिहार के छात्रों के लिए यह ग्लोबल गेटवे फिलहाल बंद है। केंद्र सरकार और एआईसीटीई की कई रिसर्च ग्रांट, लैब डेवलपमेंट फंड और छात्रों के लिए स्कॉलरशिप केवल एनबीए मान्यता प्राप्त संस्थानों को ही प्राथमिकता के आधार पर दी जाती है।

सीनियर प्रोफेसरों (पीएचडी होल्डर्स) की भारी कमी

सूत्रों और शिक्षाविदों की मानें तो बिहार के इंजीनियरिंग कॉलेज एनबीए के कड़े मानकों को पूरा करने में हांफ रहे हैं। इसके पीछे मुख्य वजह अधिकांश कॉलेजों में नियमित और सीनियर प्रोफेसरों (पीएचडी होल्डर्स) की भारी कमी है। अनुबंध (कॉन्ट्रैक्ट) के भरोसे गाड़ी खिंच रही है।संस्थानों में रिसर्च वर्क, अंतरराष्ट्रीय जर्नल्स में पेपर पब्लिकेशन और पेटेंट कराने की संस्कृति न के बराबर है। कई नए सरकारी कॉलेजों के पास अपनी आधुनिक लैब, एडवांस सॉफ्टवेयर और अंतरराष्ट्रीय स्तर की लाइब्रेरी की व्यवस्था नहीं है। इसके साथ ही, कॉलेजों का स्थानीय या राष्ट्रीय उद्योगों के साथ कोई मजबूत तालमेल नहीं है, जिससे छात्रों को व्यावहारिक ज्ञान नहीं मिल पाता। |

प्रतिभा के बावजूद कम पैकेज पर करना पड़ता है संतोष

शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक बिहार सरकार और निजी प्रबंधन युद्धस्तर पर फैकल्टी की कमी को दूर नहीं करते और लैब्स को अपग्रेड नहीं करते, तब तक स्थिति नहीं बदलेगी। बिना एनबीए के बिहार के ये कॉलेज राष्ट्रीय रैंकिंग (एनआईआरएफ) में भी कहीं नहीं ठहरते। वहींं छात्रोंं का कहना है कि हम फीस पूरी देते हैं, मेहनत भी करते हैं, लेकिन जब इंटरव्यू में पूछा जाता है कि क्या आपका कॉलेज एनबीए एक्रेडिटेड है, तो हमें ना कहना पड़ता है। हमारी प्रतिभा होने के बावजूद हमें कम पैकेज पर संतोष करना पड़ता है।