बिहार में महासर्वे : राज्य के 45 हजार गांवों में से 9334 मौजों का कैडस्ट्रल रिकॉर्ड गायब; अंचल कार्यालयों से पन्ने फाड़ने का खेल उजागर

बिहार में करीब 90 साल बाद शुरू हुआ जमीन सर्वे का काम बड़े चक्रव्यूह में फंस गया है। राज्य के 38 जिलों के 45 हजार गांवों की जमीनी हकीकत खंगालने उतरी सरकार के सामने अब तक का सबसे बड़ा संकट खड़ा हो गया है। राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग की आंतरिक रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य के 9334 मौजों (गांवों) के कैडस्ट्रल खतियान (मूल जमीनी रिकॉर्ड) ही सरकारी रिकॉर्ड रूम से गायब हैं।

बिहार में महासर्वे : राज्य के 45 हजार गांवों में से 9334 मौजों का कैडस्ट्रल रिकॉर्ड गायब; अंचल कार्यालयों से पन्ने फाड़ने का खेल उजागर

DESWA DESK : बिहार में करीब 90 साल बाद शुरू हुआ जमीन सर्वे का काम बड़े चक्रव्यूह में फंस गया है। राज्य के 38 जिलों के 45 हजार गांवों की जमीनी हकीकत खंगालने उतरी सरकार के सामने अब तक का सबसे बड़ा संकट खड़ा हो गया है। राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग की आंतरिक रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य के 9334 मौजों (गांवों) के कैडस्ट्रल खतियान (मूल जमीनी रिकॉर्ड) ही सरकारी रिकॉर्ड रूम से गायब हैं।

चौंकाने वाला खुलासा यह है कि अंचल कार्यालयों में रिकॉर्ड के डिजिटाइजेशन और ऑनलाइन होने से ठीक पहले स्थानीय भू-माफियाओं ने अधिकारियों और कर्मचारियों की मिलीभगत से खतियान के पन्ने या तो फाड़ दिए या पूरे के पूरे दस्तावेज ही गायब कर दिए। इस संगठित खेल का असर यह हुआ है कि 1.92 करोड़ रैयतों (जमीन मालिकों) के भविष्य पर संशय के बादल मंडराने लगे हैं।

सरकारी रिपोर्ट के अनुसार, रिकॉर्ड गायब होने की सबसे भयावह स्थिति सीमांचल और भागलपुर प्रमंडल में है। माफियाओं ने उन इलाकों को सबसे ज्यादा निशाना बनाया जहां जमीन की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं या जहां मालिकाना हक को लेकर पहले से विवाद थे। चिंता की बात यह है कि सूबे की राजधानी पटना भी इससे अछूती नहीं है, यहां के 104 गांवों के मूल रिकॉर्ड गायब हैं। राहत की बात सिर्फ इतनी है कि तिरहुत प्रमंडल की स्थिति बाकी जिलों से अपेक्षाकृत बेहतर पाई गई है।

2019 में जब जमीन सर्वे का पहला चरण शुरू हुआ था, तब नीतीश सरकार को उम्मीद थी कि इससे बिहार में सत्तर फीसदी आपराधिक मामलों की जड़ यानी जमीन विवाद को खत्म कर दिया जाएगा। लेकिन जमीनी हकीकत ने सरकार के दावों की हवा निकाल दी है। सर्वे को पूरा करने की समय-सीमा अब तक तीन बार बढ़ाई जा चुकी है:

 सर्वे के इस कदर लटकने और पेचीदा होने के पीछे दो और बड़े कारण हैं। पहला, बिहार में अधिकांश रैयतों के पास जो खतियान हैं, वे 100 साल से भी अधिक पुराने हैं। दूसरा, पीढ़ियों से जमीनों का पारिवारिक बंटवारा (म्यूटेशन या जमाबंदी) कानूनी रूप से दर्ज नहीं है। लोग मौखिक बंटवारे पर खेती कर रहे हैं। अब जब सर्वे टीम कागजात मांग रही है, तो रैयतों के पास पूर्वजों के नाम के अलावा कुछ नहीं है।

मूल खतियान गायब होने से उन रैयतों में डर है जिनकी जमीन पर दबंगों की नजर है। बिना सरकारी रिकॉर्ड के वे अपना दावा कैसे साबित करेंगे? विभाग अब उन अंचल कर्मियों और अधिकारियों को चिह्नित करने में जुटा है जिनके कार्यकाल के दौरान ये पन्ने फाड़े गए। अब सरकार को या तो लगान रसीदों, पुराने रजिस्ट्री दस्तावेजों या फिर विशेष अदालती आदेशों के आधार पर नए सिरे से रिकॉर्ड तैयार करना होगा, जो बेहद समय लेने वाली प्रक्रिया है।

 बिहार में जमीन का टुकड़ा सिर्फ संपत्ति नहीं, प्रतिष्ठा और वजूद की लड़ाई है। अगर 9300 से अधिक मौजों के दस्तावेज गायब हैं, तो यह सीधे तौर पर कानून-व्यवस्था और न्याय प्रणाली को चुनौती है। सरकार को डिजिटल बैकअप और जिला स्तर पर विशेष शिविर लगाकर इस 'क्राइम' को ठीक करना होगा, वरना दिसंबर 2027 की डेडलाइन भी छोटी पड़ जाएगी।