सारण के इस स्कूल में सात सौ छात्र और 22 शिक्षक, पर बैठने को एक भी क्लासरूम नहीं,  बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ क्यों ? 

जहां एक तरफ करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाकर डिजिटल क्लासरूम और हाईटेक इंफ्रास्ट्रक्चर के दावे किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ मांझी प्रखंड के उत्क्रमित मध्य सह उच्चत्तर माध्यमिक विद्यालय, मरहां से आई तस्वीर समूची व्यवस्था को झकझोरने वाली है।

सारण के इस स्कूल में सात सौ छात्र और 22 शिक्षक, पर बैठने को एक भी क्लासरूम नहीं,  बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ क्यों ? 

DESWA DESK : बिहार में सरकारी शिक्षा व्यवस्था को स्मार्ट और आधुनिक बनाने के दावों की हवा सारण जिले के एक स्कूल ने पूरी तरह निकाल दी है। जहां एक तरफ करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाकर डिजिटल क्लासरूम और हाईटेक इंफ्रास्ट्रक्चर के दावे किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ मांझी प्रखंड के उत्क्रमित मध्य सह उच्चत्तर माध्यमिक विद्यालय, मरहां से आई तस्वीर समूची व्यवस्था को झकझोरने वाली है।

इस विद्यालय की विडंबना ऐसी है कि इस पर यकीन करना मुश्किल हो जाए। स्कूल में करीब सात सौ बच्चों का भविष्य संवारने के लिए 22 शिक्षकों की हर दिन हाजिरी तो बनती है, लेकिन बच्चों को पढ़ाने के लिए पूरे स्कूल में एक भी क्लासरूम मयस्सर नहीं है। नतीजतन, देश का भविष्य कहे जाने वाले ये सैकड़ों नौनिहाल सालों भर खुले आसमान के नीचे, पेड़ की छांव में जमीन पर बैठकर ककहरा सीखने को मजबूर हैं।

ग्रामीणों और स्कूल से मिली जानकारी के मुताबिक इस विशाल छात्र संख्या वाले स्कूल के नाम पर पूरे परिसर में ईंट-गारे के सिर्फ दो ही कमरे खड़े हैं। पहले कमरे का उपयोग पूरी तरह से विद्यालय के कार्यालय (ऑफिस) और प्रधानाध्यापक के कक्ष के रूप में होता है, जबकि दूसरे कमरे में स्कूल की विभिन्न शैक्षणिक सामग्रियां, मिड-डे मील का सामान और कबाड़ रखा जाता है।

 नतीजा यह है कि कक्षा उच्चत्तर माध्यमिक तक के बच्चों के पास बैठने की कोई जगह नहीं है। मौसम चाहे चिलचिलाती धूप का हो, हाड़ कंपाने वाली ठंड का या फिर मॉनसून की बौछारों का, बच्चों की क्लास पेड़ के नीचे ही सजती है। बारिश के दिनों में तो स्थिति और भयावह हो जाती है, जब स्कूल में अघोषित छुट्टी जैसा माहौल हो जाता है।

सरकार ने इसे मध्य विद्यालय से उच्चत्तर माध्यमिक (प्लस टू) का दर्जा तो दे दिया, ताकि कागजों पर शिक्षा का ग्राफ ऊंचा दिखे, लेकिन बुनियादी ढांचे के नाम पर एक ईंट तक नहीं जोड़ी गई। यह मामला न केवल शिक्षा विभाग की संवेदनहीनता को दर्शाता है, बल्कि सरकारी राजस्व और मानव संसाधन की खुली बर्बादी का भी सबूत है। इस बदहाली ने कई तीखे सवाल खड़े कर दिए हैं। 

जब विद्यालय में सात सौ बच्चों के बैठने के लिए एक भी कमरा नहीं था, तो बिना इंफ्रास्ट्रक्चर के इसे उच्चत्तर माध्यमिक का दर्जा क्यों और किस आधार पर दिया गया? शिक्षकों का वेतन हर महीने सरकारी खजाने से दिया जा रहा है। जब शिक्षक और छात्र दोनों उपलब्ध हैं, तो सिर्फ कमरों के अभाव में बच्चों के भविष्य से यह खिलवाड़ कब तक चलेगा? शिक्षा विभाग के आला अधिकारी, जो आए दिन निरीक्षण के नाम पर कड़े निर्देश जारी करते हैं, उन्हें सारण के इस व्यथा आखिर सुनाई क्यों नहीं दी?

वहीं, अभिभावकों का कहना है कि हमारे बच्चे ज्ञान लेने स्कूल जाते हैं, लेकिन वहां का माहौल देखकर तरस आता है। धूल, धूप और अब मानसून में बारिश के बीच बच्चे कैसे एकाग्र होकर पढ़ सकते हैं? बड़े घरों के बच्चे निजी स्कूलों में जा रहे हैं, और हमारे बच्चों के हिस्से सिर्फ पेड़ की छांव और आश्वासन आ रहे हैं।