बिहार पंचायत चुनाव में इसबार बदलेगा आरक्षण रोस्टर, गांवों में बढ़ी धड़कनें, कई दिग्गजों के समीकरण बिगड़ने के आसार

नई जनगणना के आधिकारिक आंकड़े उपलब्ध न होने के कारण सरकार फिलहाल पुराने डेटा के अनुसार ही सीटों का निर्धारण कर रही है। जिला स्तर पर पंचायतवार जनसंख्या और जातिगत आंकड़ों को तेजी से आधिकारिक पोर्टल पर अपलोड किया जा रहा है। स्क्रूटनी के बाद जल्द ही जिलाधिकारियों द्वारा अंतिम आरक्षण सूची जारी कर दी जाएगी।

बिहार पंचायत चुनाव में इसबार बदलेगा आरक्षण रोस्टर, गांवों में बढ़ी धड़कनें, कई दिग्गजों के समीकरण बिगड़ने के आसार

DESWA NEWS : बिहार में पंचायत चुनाव-2026 की तैयारियां अपने अंतिम चरण में पहुंच चुकी हैं। हालांकि राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा अभी तक चुनाव की आधिकारिक तारीखों का ऐलान नहीं किया गया है, लेकिन ग्रामीण इलाकों में सियासी पारा पूरी तरह चढ़ चुका है। इस बार के चुनाव में सबसे बड़ी हलचल और चर्चा का विषय पंचायतों का नया आरक्षण रोस्टर है। माना जा रहा है कि करीब एक दशक बाद कई पंचायतों में आरक्षण की श्रेणियां बदलने जा रही हैं, जिसने वर्तमान जनप्रतिनिधियों से लेकर नए दावेदारों की नींद उड़ा दी है।

पंचायती राज नियमों के मुताबिक, पंचायतों में आरक्षण की व्यवस्था स्थायी नहीं होती, बल्कि इसे रोटेशन प्रणाली के तहत तय किया जाता है। बिहार में आखिरी बार वर्ष 2016 में नया आरक्षण रोस्टर लागू किया गया था। अब वर्ष 2026 में दस साल का चक्र पूरा होने के कारण बड़े पैमाने पर बदलाव की संभावना है। सूत्रों के मुताबिक, इस बदलाव के चलते कई ऐसी सीटें जो लंबे समय से सामान्य थीं, वे आरक्षित श्रेणियों (एससी, एसटी, ओबीसी या महिला) के खाते में जा सकती हैं। वहीं, कुछ आरक्षित सीटें इस बार सामान्य वर्ग के लिए खुल सकती हैं।

पंचायत स्तर पर त्रिस्तरीय शासन व्यवस्था के तहत कुल छह पदों के लिए मतदान होना है, जिनका भाग्य इस नए रोस्टर से तय होगा। इनमें मुखिया, सरपंच, पंचायत समिति सदस्य, जिला परिषद सदस्य, वार्ड सदस्य और पंच शामिल हैं। इस बार भी आरक्षण रोस्टर को तैयार करने के लिए वर्ष 2011 की जनगणना के आंकड़ों को ही आधार बनाया जा रहा है। नई जनगणना के आधिकारिक आंकड़े उपलब्ध न होने के कारण सरकार फिलहाल पुराने डेटा के अनुसार ही सीटों का निर्धारण कर रही है। जिला स्तर पर पंचायतवार जनसंख्या और जातिगत आंकड़ों को तेजी से आधिकारिक पोर्टल पर अपलोड किया जा रहा है। स्क्रूटनी के बाद जल्द ही जिलाधिकारियों द्वारा अंतिम आरक्षण सूची जारी कर दी जाएगी।

आरक्षण में संभावित फेरबदल ने वर्तमान मुखिया, सरपंच और जिला परिषद सदस्यों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। कई सीटिंग माननीयों को डर है कि उनकी पारंपरिक सीट किसी अन्य वर्ग या महिला के लिए आरक्षित हो सकती है। ऐसी स्थिति में दिग्गजों ने अभी से 'प्लान-बी' पर काम करना शुरू कर दिया है। कुछ नेता अपनी पत्नियों या परिवार के अन्य सदस्यों को मैदान में उतारने की तैयारी कर रहे हैं, तो कुछ पड़ोसी पंचायतों या अन्य क्षेत्रों में सुरक्षित ठिकाने की तलाश में जुट गए हैं।

अंतिम सूची जारी होने से पहले ही गांवों में संभावित उम्मीदवारों की सक्रियता बढ़ गई है। शादी-ब्याह, श्राद्धकर्म से लेकर हर छोटे-बड़े सामाजिक आयोजनों में नेताओं की हाजिरी लग रही है। हालांकि चतुर खिलाड़ी अभी औपचारिक घोषणा करने से बच रहे हैं। दावेदारों का स्पष्ट कहना है, पहले रोस्टर साफ हो जाए, उसके बाद ही पत्ता खोलेंगे।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि इस बार बड़े पैमाने पर रोस्टर बदला, तो बिहार की ग्रामीण राजनीति में एक बड़ा 'जेनरेशन शिफ्ट' (पीढ़ीगत बदलाव) देखने को मिलेगा। कई पुराने क्षत्रपों का सियासी विस्थापन हो सकता है और बड़ी संख्या में नए व युवा चेहरे नेतृत्व में सामने आएंगे। फिलहाल, सबकी नजरें राज्य निर्वाचन आयोग और पंचायती राज विभाग की अंतिम अधिसूचना पर टिकी हैं। इस सूची के आते ही बिहार पंचायत चुनाव 2026 की असली और साफ तस्वीर सामने आ जाएगी।