बांकीपुर उपचुनाव : नितिन नवीन की पारंपरिक सीट पर भाजपा राष्ट्रीय नेतृत्व के साख की 'अग्निपरीक्षा', महागठबंधन के साथ पीके ने भी ठोकी ताल 

बांकीपुर भाजपा का वह अभेद्य किला है जहां विपक्ष दशकों से सेंध लगाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन इस बार का रण अलग है। इस चुनाव में केवल एक विधायक नहीं चुना जाना है, बल्कि यह भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की सांगठनिक नीतियों, राजद की आक्रामकता और चुनावी मैदान में उतर रहे जन सुराज की जमीनी ताकत की कड़ी परीक्षा भी साबित होने वाला है।

बांकीपुर उपचुनाव : नितिन नवीन की पारंपरिक सीट पर भाजपा राष्ट्रीय नेतृत्व के साख की 'अग्निपरीक्षा', महागठबंधन के साथ पीके ने भी ठोकी ताल 

DESWA DESK : बिहार की सबसे हाई-प्रोफाइल सीटों में शुमार पटना की बांकीपुर विधानसभा सीट पर उपचुनाव का बिगुल बज चुका है। यह उपचुनाव कोई आम चुनावी मुकाबला नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की राजनीतिक साख और प्रतिष्ठा से जुड़ा है। नितिन नवीन के राज्यसभा सांसद चुने जाने के बाद विधायक पद से दिए गए इस्तीफे के कारण यह सीट खाली हुई है। आगामी 13 जुलाई को नामांकन की आखिरी तारीख है, और जैसे-जैसे समय नजदीक आ रहा है, राजधानी का सियासी पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया है।

बांकीपुर भाजपा का वह अभेद्य किला है जहां विपक्ष दशकों से सेंध लगाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन इस बार का रण अलग है। इस चुनाव में केवल एक विधायक नहीं चुना जाना है, बल्कि यह भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की सांगठनिक नीतियों, राजद की आक्रामकता और चुनावी मैदान में उतर रहे जन सुराज की जमीनी ताकत की कड़ी परीक्षा भी साबित होने वाला है। बांकीपुर सीट के इतिहास पर नजर डालें तो इस क्षेत्र को पहले पटना पश्चिम के नाम से जाना जाता था। साल 2008 में हुए परिसीमन के बाद इसका नाम बांकीपुर हुआ। इस सीट का मिजाज हमेशा से भाजपा और नवीन परिवार के अनुकूल रहा है। 

1995 की शुरुआत में नितिन नवीन के पिता नवीन किशोर सिन्हा पहली बार पटना पश्चिम से भाजपा के टिकट पर विधायक बने। वर्ष 2005 में नवीन किशोर सिन्हा के असामयिक निधन के बाद उनके युवा पुत्र नितिन नवीन ने महज 26 साल की उम्र में 2006 के उपचुनाव में जीत हासिल कर इस राजनीतिक विरासत को संभाला। लगातार पांच बार नितिन नवीन ने इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। 2020 के चुनाव में उन्होंने यहां लव सिन्हा (शत्रुघ्न सिन्हा के पुत्र) और पुष्पम प्रिया चौधरी जैसे चर्चित चेहरों को भारी मतों के अंतर से शिकस्त दी थी। इस बार बांकीपुर की लड़ाई बहुकोणीय होने की उम्मीद है। मुख्य मुकाबला मुख्य रूप से तीन धुरियों के इर्द-गिर्द घूमता दिख रहा है।

भाजपा अपनी इस पारंपरिक सीट को किसी भी कीमत पर गंवाना नहीं चाहती। राष्ट्रीय अध्यक्ष की सीट होने के कारण साख दांव पर है। वहीं, महागठबंधन की ओर से राजद मजबूत उम्मीदवार उतारकर भाजपा के इस सबसे मजबूत शहरी किले को ढाहने की फिराक में है। वहीं. राजनीतिक गलियारों में इस बात की पुरजोर चर्चा है कि प्रशांत किशोर (पीके) खुद इस सीट से चुनाव लड़कर बिहार की राजनीति में एक बड़ा धमाका कर सकते हैं। यदि ऐसा होता है, तो बांकीपुर देश का सबसे हॉट चुनावी अखाड़ा बन जाएगा। 

चूंकि मामला खुद राष्ट्रीय अध्यक्ष से सीधा जुड़ा हुआ है, इसलिए भाजपा के प्रदेश नेतृत्व ने इस सीट के उम्मीदवार को लेकर पूरी तरह से मौन धारण कर रखा है। सूत्रों के मुताबिक, पार्टी के भीतर इस सीट को लेकर कोई आंतरिक कलह या खींचतान नहीं है। बांकीपुर की जनता के लिए नितिन नवीन आज भी 'घर के बच्चे' जैसे हैं। इसलिए अगला उम्मीदवार कौन होगा, यह पूरी तरह से नितिन नवीन की पसंद पर निर्भर करेगा। प्रदेश संगठन सिर्फ उनके फैसले पर सिर्फ मुहर लगाएगा। बांकीपुर उपचुनाव के लिए नामांकन की आखिरी तारीख 13 जुलाई होने के कारण भाजपा अपने पत्ते जल्द खोल सकती है। देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा अपने इस सबसे सुरक्षित किले को बचाने के लिए किस चेहरे पर दांव लगाती है और विपक्ष इस चक्रव्यूह को भेदने के लिए क्या रणनीति अपनाता है।