दीपक प्रकाश के मंत्री पद पर पेंच : छह महीने बाद भी बिना सदन सदस्य बने कुर्सी पर क्यों? सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार को भेजा नोटिस
दो-दो बार मंत्री पद की शपथ लेने और लंबा समय बीत जाने के बावजूद दीपक प्रकाश विधानमंडल के किसी भी सदन के सदस्य नहीं बन पाए हैं। याचिका पर सुनवाई करते हुए सीजेआई की पीठ ने स्पष्ट किया कि यह कोई राजनीतिक विषय नहीं, बल्कि पूरी तरह से संवैधानिक और कानूनी व्याख्या का मामला है। अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि लगातार या नए सिरे से शपथ दिलाकर छह महीने की तय संवैधानिक सीमा को तकनीकी रूप से बाईपास करना संविधान की भावना के खिलाफ है।
DESWA DESK : राष्ट्रीय लोक मोर्चा (आरएलएम) के सुप्रीमो व पूर्व केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा के बेटे और प्रदेश के पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश का मंत्री पद कानूनी पेंच में फंस गया है। बिना विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य बने लगातार छह महीने से अधिक समय तक मंत्री पद पर बने रहने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है।
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को नोटिस जारी किया है और सीधा सवाल पूछा है कि राज्य सरकार यह बताए कि कोई व्यक्ति बिना विधानमंडल का सदस्य चुने गए छह महीने से ज्यादा समय तक मंत्री पद पर कैसे बना रह सकता है?
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 164(4) के तहत कोई भी व्यक्ति बिना विधानमंडल का सदस्य बने केवल छह महीने तक ही मंत्री पद पर रह सकता है। इस अवधि के भीतर उसे विधानसभा या विधान परिषद में से किसी एक सदन की सदस्यता हासिल करना अनिवार्य होता है।
दीपक प्रकाश के मामले में विवाद की मुख्य वजह यह है कि वर्ष 2025 के विधानसभा चुनाव के बाद गठित नीतीश कुमार की सरकार में दीपक प्रकाश को पंचायती राज मंत्री बनाया गया था। इसके बाद राज्य में सत्ता और नेतृत्व बदलने के बाद जब सम्राट चौधरी ने मुख्यमंत्री पद की कमान संभाली, तब दीपक प्रकाश ने दोबारा पंचायती राज मंत्री के रूप में शपथ ली।
दो-दो बार मंत्री पद की शपथ लेने और लंबा समय बीत जाने के बावजूद दीपक प्रकाश विधानमंडल के किसी भी सदन के सदस्य नहीं बन पाए हैं। याचिका पर सुनवाई करते हुए सीजेआई की पीठ ने स्पष्ट किया कि यह कोई राजनीतिक विषय नहीं, बल्कि पूरी तरह से संवैधानिक और कानूनी व्याख्या का मामला है। अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि लगातार या नए सिरे से शपथ दिलाकर छह महीने की तय संवैधानिक सीमा को तकनीकी रूप से बाईपास करना संविधान की भावना के खिलाफ है।
सुप्रीम कोर्ट के इस कड़े रुख के बाद बिहार के सियासी गलियारों में भारी खलबली मच गई है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार न्यायालय के सामने संतोषजनक जवाब नहीं दे पाती है, तो दीपक प्रकाश को तत्काल प्रभाव से अपने पद से इस्तीफा देना पड़ सकता है। अब सबकी निगाहें बिहार सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किए जाने वाले जवाब पर टिकी है।













