उपेंद्र कुशवाहा के 'प्रेशर गेम' से टला बेटे का संकट; देवेश की बलि से बची दीपक प्रकाश की कुर्सी, आठ माह बाद क्या होगा..?
बिहार की राजनीति में लव-कुश (कुर्मी-कोईरी) समीकरण का दबदबा एक बार फिर साबित हुआ है। राष्ट्रीय लोक मोर्चा (आएलएम) के प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा की 'प्रेशर पाॅलिटिक्स' के आगे आखिरकार बीजेपी आलाकमान को झुकना पड़ा है। सुप्रीम कोर्ट की सख्ती और कानूनी दावपेंच के बीच अपने बेटे दीपक प्रकाश की कैबिनेट कुर्सी बचाने में उपेंद्र कुशवाहा कामयाब रहे हैं।
DESWA DESK : बिहार की राजनीति में लव-कुश (कुर्मी-कोईरी) समीकरण का दबदबा एक बार फिर साबित हुआ है। राष्ट्रीय लोक मोर्चा (आएलएम) के प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा की 'प्रेशर पाॅलिटिक्स' के आगे आखिरकार बीजेपी आलाकमान को झुकना पड़ा है। सुप्रीम कोर्ट की सख्ती और कानूनी दावपेंच के बीच अपने बेटे दीपक प्रकाश की कैबिनेट कुर्सी बचाने में उपेंद्र कुशवाहा कामयाब रहे हैं।
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, दिल्ली से आए एक फरमान के बाद विधान परिषद के सभापति अवधेश नारायण सिंह को भाजपा एमएलसी देवेश कुमार ने अपना इस्तीफा सौंप दिया। इस तरह पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश के लिए विधान परिषद जाने का रास्ता तो साफ हो गया, लेकिन यह राहत सिर्फ कुछ महीनों के लिए ही मानी जा रही है।
बिहार सरकार में पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश अबतक न तो विधानसभा के सदस्य थे और न ही विधान परिषद के। बिना किसी सदन का सदस्य बने छह महीने से अधिक समय तक मंत्री बने रहने के मामले पर हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए सवाल खड़े किए थे। दीपक का मंत्री पद जाना लगभग तय माना जा रहा था, लेकिन उपेंद्र कुशवाहा अपनी जिद्द पर अड़े रहे। उन्होंने न तो बेटे का इस्तीफा कराया और न ही पार्टी का विलय भाजपा में करने के दबाव को स्वीकार किया।
उपेंद्र कुशवाहा ने साफ लहजे में कहा कि दीपक दो-चार महीने के लिए नहीं, बल्कि पूरे पांच साल तक मंत्री बने रहने के लिए आए हैं। बिहार में आगामी चुनाव के समीकरणों को देखते हुए राज्य और दिल्ली के शीर्ष भाजपा नेतृत्व ने आखिरकार कुशवाहा की शर्त मान ली और देवेश कुमार को बीजेपी एलएलसी पद से इस्तीफा देने के लिए राजी कर लिया गया। हालांकि किस परिस्थिति में देवेश कुमार ने यह बात स्वीकारी होगी, यह लोग बखूबी समझ रहे हैं।
भाजपा के समर्पित रणनीतिकार माने जाने वाले देवेश कुमार से इस्तीफा दिलवाए जाने के बाद अब संगठन में उन्हें बड़ी जिम्मेदारी दिए जाने की चर्चा है।
बता दें कि देवेश कुमार 17 मार्च 2021 को राज्यपाल मनोनीत कोटे से एमएलसी बने थे। उनका कार्यकाल मार्च 2027 तक ही शेष था। अब देवेश कुमार की खाली हुई सीट पर यदि दीपक प्रकाश विधान परिषद जाते हैं, तो उन्हें केवल देवेश का बचा हुआ कार्यकाल यानी अगले साल मार्च तक ही मिलेगा। इसका मतलब है कि महज आठ महीने बाद दीपक प्रकाश के सामने एक बार फिर वही संवैधानिक संकट आ खड़ा होगा। आठ महीने बाद उन्हें फिर से सदन का सदस्य बनाने के लिए किसी नई व्यवस्था या त्यागपत्र का सहारा लेना पड़ेगा, वरना उनकी कुर्सी पर दोबारा खतरा मंडराने लगेगा।
दरअसल, पिछले विधानसभा चुनाव में लव-कुश समीकरण भाजपा के लिए बेहद निर्णायक रहा है। कुशवाहा समुदाय को नाराज करना एनडीए के लिए बड़ा सियासी नुकसान साबित हो सकता था। इसके साथ ही, गठबंधन में टूट का भी खतरा बना हुआ था। आरएलएम के पास चार विधायक हैं, जिनमें उपेंद्र कुशवाहा की पत्नी स्नेहलता कुशवाहा भी शामिल हैं। राजनीतिक विश्लेषक बताते हैं कि एनडीए के भीतर राजनीतिक स्थिरता बनाए रखने के लिए यह कदम उठाना भाजपा की मजबूरी बन गई थी। वहीं, अगले साल होने वाले यूपी चुनाव से ठीक पहले किसी सहयोगी दल के साथ टकराव का संदेश देने से एनडीए आलाकमान बचना चाहता था।













