मतदाताओं को साधने में क्यों नाकाम रही भाजपा ? कैसे एक झटके में प्रशांत किशोर ने ढाह दिया बांकीपुर का 31 साल पुराना किला
मात्र नौ महीने पहले 51936 वोटों के भारी अंतर से बांकीपुर का चुनाव जीतने वाली भाजपा इस बार कुल 51 हजार वोटों का आंकड़ा भी हासिल नहीं कर सकी। जन सुराज पार्टी के सूत्रधार प्रशांत किशोर ने भाजपा के प्रत्याशी नीरज सिन्हा को 19324 वोटों के अंतर से एकतरफा मुकाबले में पराजित कर दिया। यह हार केवल स्थानीय प्रत्याशी की हार नहीं है, बल्कि भाजपा के शीर्ष नेतृत्व नितिन नवीन और प्रदेश संजय सरावगी के राजनीतिक प्रभाव पर भी बड़ा झटका माना जा रहा है।
DESWA DESK : बिहार की राजनीति में तीन अगस्त 2026 का दिन एक बड़े राजनीतिक उलटफेर का गवाह बना। राजधानी पटना की सबसे सुरक्षित और भारतीय जनता पार्टी की पारंपरिक मानी जाने वाली बांकीपुर विधानसभा सीट का गणित पूरी तरह बदल गया है। पिछले 31 वर्षों से अजय रही भाजपा का अभेद्य किला आखिरकार ढह गया।
मात्र नौ महीने पहले 51936 वोटों के भारी अंतर से बांकीपुर का चुनाव जीतने वाली भाजपा इस बार कुल 51 हजार वोटों का आंकड़ा भी हासिल नहीं कर सकी। जन सुराज पार्टी के सूत्रधार प्रशांत किशोर ने भाजपा के प्रत्याशी नीरज सिन्हा को 19324 वोटों के अंतर से एकतरफा मुकाबले में पराजित कर दिया। यह हार केवल स्थानीय प्रत्याशी की हार नहीं है, बल्कि भाजपा के शीर्ष नेतृत्व नितिन नवीन और प्रदेश संजय सरावगी के राजनीतिक प्रभाव पर भी बड़ा झटका माना जा रहा है।
1995 से इस सीट पर भाजपा लगातार चुनाव जीतती आ रही थी। राजनीतिक विश्लेषकों और जमीनी पड़ताल के आधार पर भाजपा की इस शिकस्त के पीछे कई बड़े मुख्य कारण उभरकर सामने आए हैं। 3.79 लाख मतदाताओं वाले बांकीपुर क्षेत्र में लगभग 14 फीसदी युवा मतदाता हैं। चुनाव प्रचार के दौरान पटना व दिल्ली में छात्रों पर हुए लाठीचार्ज और पेपर लीक के वीडियो युवाओं में लगातार प्रसारित हुए। चूंकि छात्रों के प्रदर्शन का मुख्य केंद्र बांकीपुर क्षेत्र ही रहा, इसलिए इसकी तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली। इस वर्ग ने मतदान के दिन जन सुराज के चुनाव चिह्न स्कूल का बस्ता पर बटन दबाकर अपना विरोध दर्ज कराया।
जनवरी में आए यूजीसी इक्विटी रेगुलेशंस से सवर्ण समाज में अंदरूनी असंतोष था। इसके बाद जहानाबाद नीट छात्रा मामला और भरत तिवारी एनकाउंटर ने इस आग में घी का काम किया। सवर्णों की यह नाराजगी कई बूथों पर साफ़ दिखी। जहां पारंपरिक रूप से भाजपा को अधिक वोट मिलते थे, वहां के मतदाताओं ने भी बदलाव के पक्ष में मतदान किया। 40 स्टार प्रचारकों की फौज उतारने और अंतिम समय की बैठकों के बावजूद भाजपा मतदाताओं को साधने में नाकाम रही।
प्रशांत किशोर ने अपने पूरे चुनावी भाषणों में इस बात को जोरशोर से उठाया कि भाजपा कहती है कि यहां से कुत्ता या बिल्ली को भी खड़ा कर देंगे तो जीत जाएंगे। यद्यपि इस बयान का कोई प्रामाणिक वीडियो सामने नहीं आया, लेकिन मतदाताओं के स्वाभिमान को छुए इस मुद्दे ने भाजपा के खिलाफ एक गुप्त लहर का रूप ले लिया। चूंकि बांकीपुर में पढ़े-लिखे लोगों की बहुलता है, इसलिए यहां की जनता एक ऐसा प्रतिनिधि चाहती थी जो राज्य और राष्ट्रीय पटल पर उनकी आवाज मजबूती से रख सके। प्रशांत किशोर के राष्ट्रीय चेहरे और प्रखर वक्ता की छवि के मुकाबले भाजपा के नीरज सिन्हा एक कमजोर प्रत्याशी साबित हुए।
अभिषेक कुमार बंटी का नामांकन वापस कराए जाने से बैकफुट पर आई भाजपा अपने नए उम्मीदवार नीरज सिन्हा की झिझक और स्पष्ट राय न रख पाने की कमी को छुपा नहीं सकी। जन सुराज ने अपने पूरे प्रचार अभियान को शिक्षा, रोजगार, पलायन और बिहार बनाम गुजरात के विकास मॉडल पर केंद्रित रखा। प्रशांत किशोर का यह सवाल कि बिहार ने 30 सांसद दिए फिर भी यहां सिर्फ पलायन के लिए ट्रेनें क्यों चलाई जाती हैं, कारखाने क्यों नहीं? सीधे मध्यम वर्ग के दिल में उतरा। भाजपा नेता प्रशांत किशोर पर रणनीतिकार होने का ठप्पा लगाते रहे, लेकिन उनके द्वारा उठाए गए बुनियादी मुद्दों का ठोस वैचारिक या तथ्यात्मक उत्तर नहीं दे पाए।
तीन दशकों की लगातार जीत ने स्थानीय भाजपा संगठन में अति आत्मविश्वास भर दिया था। जमीनी स्तर पर बदलती हवा, खासकर पढ़े-लिखे वोटर और युवाओं के मोहभंग को भांपने में स्थानीय कैडर पूरी तरह विफल रहा। बांकीपुर का परिणाम बिहार की शहरी राजनीति में एक नए युग का संकेत दे रहा है। पारंपरिक जातीय और दलीय समीकरणों से इतर, जब कोई तीसरा विकल्प जनता के सामने शिक्षित नेतृत्व और नीतिगत मुद्दों का खाका रखता है, तो दशकों पुराने किले भी ढह सकते हैं। बांकीपुर उपचुनाव का यह परिणाम इसका प्रत्यक्ष उदाहरण बन है।













