पटना हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: सिर्फ ब्रेथ एनालाइजर टेस्ट के दम पर जेल नहीं, शराब पीने की पुष्टि के लिए अब ब्लड टेस्ट अनिवार्य

बिहार में शराबबंदी कानून के क्रियान्वयन को लेकर हाईकोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि केवल ब्रेथ एनालाइजर (श्वास विश्लेषक) की जांच रिपोर्ट को किसी व्यक्ति को शराब पीने का दोषी मानने का एकमात्र आधार नहीं बनाया जा सकता। अदालत के मुताबिक, आरोपी पर दोष सिद्ध करने के लिए वैज्ञानिक रूप से उसके खून की जांच होना कानूनी रूप से अनिवार्य है।

पटना हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: सिर्फ ब्रेथ एनालाइजर टेस्ट के दम पर जेल नहीं, शराब पीने की पुष्टि के लिए अब ब्लड टेस्ट अनिवार्य


DESWA DESK : बिहार में शराबबंदी कानून के क्रियान्वयन को लेकर हाईकोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि केवल ब्रेथ एनालाइजर (श्वास विश्लेषक) की जांच रिपोर्ट को किसी व्यक्ति को शराब पीने का दोषी मानने का एकमात्र आधार नहीं बनाया जा सकता। अदालत के मुताबिक, आरोपी पर दोष सिद्ध करने के लिए वैज्ञानिक रूप से उसके खून की जांच होना कानूनी रूप से अनिवार्य है।

हाईकोर्ट ने मुजफ्फरपुर के एक्साइज थाने में करीब दस साल पहले दर्ज एक प्राथमिकी और उस पर निचली अदालत द्वारा लिए गए संज्ञान को पूरी तरह से खारिज करते हुए यह ऐतिहासिक आदेश दिया। मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने तकनीकी और कानूनी पहलुओं को रेखांकित किया। अदालत ने कहा कि ब्रेथ एनालाइजर टेस्ट केवल प्राथमिक संकेत दे सकता है कि किसी व्यक्ति ने शराब का सेवन किया है या नहीं। लेकिन जब तक मेडिकल विशेषज्ञ द्वारा रक्त के नमूनों की जांच कर उसमें अल्कोहल की सटीक मात्रा की पुष्टि नहीं की जाती, तब तक किसी को कानूनन अपराधी नहीं ठहराया जा सकता।

न्यायालय ने माना कि ब्रेथ एनालाइजर मशीनों में तकनीकी गड़बड़ी या अन्य बाहरी कारणों से भी रीडिंग प्रभावित हो सकती है, इसलिए इसके आधार पर किसी की स्वतंत्रता को बाधित करना न्यायसंगत नहीं है। दरअसल जिस मामले में हाईकोर्ट का ये फैसला आया है, वह मुजफ्फरपुर जिले के एक्साइज थाने से जुड़ा है, जहां 24 नवंबर 2016 को बीएमपी-6 के पास जवान मनोज ठाकुर नशे में हंगामा करते पकड़ा गया था। एक्साइज विभाम ने ब्रेथ एनालाइजर से जांच की जिसमें शरान पीने की पुष्टि हुई। गिरफ्तारी के बाद निचली अदालत ने मामले में संज्ञान ले लिया। चिकाकर्ता ने निचली अदालत के इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि पुलिस ने केवल मशीन की रीडिंग को आधार बनाया, जबकि आरोपी का कोई ब्लड या यूरिन टेस्ट नहीं कराया गया था, जो कि आबकारी कानून के तहत साक्ष्य की पुख्ता कड़ियों के लिए जरूरी है।

इस फैसले के बाद अब बिहार पुलिस और उत्पाद विभाग को केवल ऑन-स्पॉट मशीन टेस्ट के भरोसे कार्रवाई करने से बचना होगा। संदिग्धों का मेडिकल और ब्लड टेस्ट कराना अनिवार्य हो जाएगा। बिहार की विभिन्न अदालतों में शराबबंदी से जुड़े लाखों मामले लंबित हैं। इस फैसले के बाद ऐसे हजारों मामलों में आरोपियों को बड़ी राहत मिल सकती है जहां पुलिस ने ब्लड टेस्ट की रिपोर्ट चार्जशीट के साथ संलग्न नहीं की है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस आदेश से पुलिस द्वारा की जाने वाली मनमानी या मशीनी त्रुटियों के कारण निर्दोष लोगों को होने वाली परेशानी पर रोक लगेगी।