परिवहन विभाग में जून के जूनून के साथ मलाईदार पोस्टिंग का खेल शुरू, दागियों की लॉबिंग और 'बोली' की चर्चाओं से गरमाया 'प्रशासनिक बाजार'

जून का महीना तबादलों और पोस्टिंग के लिहाज से हमेशा से सबसे गर्म माना जाता रहा है, लेकिन इस बार परिवहन विभाग में ट्रांसफर-पोस्टिंग को लेकर चर्चाओं और कयासों का बाजार कुछ ज्यादा ही गर्म है। इस बार भी बड़े पैमाने पर अधिकारियों और कर्मचारियों के स्थानांतरण की तैयारी चल रही है, लेकिन इसके साथ ही पर्दे के पीछे मनचाही पोस्टिंग हासिल करने के लिए लॉबिंग, सेटिंग और मलाईदार जगहों पर पोस्टिंग के लिए भारी 'बोली' लगाए जाने की सुगबुगाहट शुरू हो गई है।

परिवहन विभाग में जून के जूनून के साथ मलाईदार पोस्टिंग का खेल शुरू, दागियों की लॉबिंग और 'बोली' की चर्चाओं से गरमाया 'प्रशासनिक बाजार'

DESWA DESK : बिहार के प्रशासनिक गलियारों में जून का महीना तबादलों और पोस्टिंग के लिहाज से हमेशा से सबसे गर्म माना जाता रहा है, लेकिन इस बार परिवहन विभाग में ट्रांसफर-पोस्टिंग को लेकर चर्चाओं और कयासों का बाजार कुछ ज्यादा ही गर्म है। इस बार भी बड़े पैमाने पर अधिकारियों और कर्मचारियों के स्थानांतरण की तैयारी चल रही है, लेकिन इसके साथ ही पर्दे के पीछे मनचाही पोस्टिंग हासिल करने के लिए लॉबिंग, सेटिंग और मलाईदार जगहों पर पोस्टिंग के लिए भारी 'बोली' लगाए जाने की सुगबुगाहट शुरू हो गई है।

राज्य के सबसे कमाऊ विभागों में शुमार परिवहन महकमे में इस बार का फेरबदल मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की अगुवाई वाली एनडीए सरकार के लिए एक बड़ी परीक्षा साबित होने वाला है। विभागीय सूत्रों की मानें तो परिवहन सेवा से जुड़े कई ऐसे अधिकारी और कर्मचारी इस बार भारी राजस्व वाले जिलों में पोस्टिंग के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं, जिन पर पहले भ्रष्टाचार, लापरवाही या विभिन्न प्रकार के गंभीर आरोप लग चुके हैं। विभागीय जांच का सामना कर चुके कई विवादित चेहरे भी रसूखदारों की परिक्रमा कर मुख्यधारा में लौटने की जुगत में हैं।

इतना ही नहीं, हाल ही में प्रोन्नत हुए कुछ अधिकारियों के बीच भी बड़े और प्रभावशाली जिलों की कुर्सी हथियाने के लिए कड़ी प्रतिस्पर्धा देखी जा रही है। सूत्रों का यहां तक दावा है कि कुछ अधिकारियों ने आपस में ही यह 'म्युचुअल' सेटिंग करने की कोशिश की है कि किसे किस जिले की कमान संभालनी है। सूत्रों के मुताबिक, राज्य के सभी 38 जिलों में परिवहन व्यवस्था को सुचारू बनाने के लिए नई तैनाती की सूची लगभग अंतिम दौर में है। इस बार सरकार एक खास संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है। आधे जिलों में बिहार प्रशासनिक सेवा के अफसरों को कमान मिल सकती है ताकि प्रशासनिक नियंत्रण बना रहे। शेष 50 प्रतिशत जिलों में मूल कैडर यानी परिवहन सेवा के अधिकारियों की तैनाती की योजना है। 

परिवहन विभाग सीधे तौर पर राजस्व संग्रह और प्रवर्तन से जुड़ा हुआ है। हाईवे पर ट्रकों-वाहनों की चेकिंग से लेकर जिला परिवहन कार्यालयों में होने वाले खेल के कारण इसे प्रशासनिक हलकों में सबसे संवेदनशील और 'मलाईदार' महकमा माना जाता रहा है। अतीत में भी यहां की ट्रांसफर-पोस्टिंग बड़े विवादों और करोड़ों के खेल के आरोपों में घिरी रही है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने सत्ता संभालते ही जीरो टॉलरेंस और सुशासन का दावा किया था। ऐसे में इस बदनाम हो चुके महकमे में बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप और त्रुटिहीन तरीके से ट्रांसफर-पोस्टिंग कराना सरकार के इकबाल के लिए एक बड़ी चुनौती है।

प्रशासनिक जानकारों का मानना है कि यदि तय कार्यकाल पूरा नहीं करने वाले नए या विवादित छवि वाले अधिकारियों को फिर से महत्वपूर्ण जिलों में तैनाती मिलती है, तो सरकार की नीयत पर उंगलियां उठना तय है। यही वजह है कि इस बार सरकार ट्रांसफर-पोस्टिंग को लेकर फूंक-फूंक कर कदम रखना चाह रही है। यह ट्रांसफर-पोस्टिंग सरकार की पारदर्शी और भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टॉलरेंस की भी अग्निपरीक्षा साबित होने वाली है। अब जब जून का महीना अपने अंतिम पड़ाव पर है, सचिवालय से लेकर जिलों तक के अधिकारियों की धड़कनें बढ़ी हुई है। देखना दिलचस्प होगा कि आगामी स्थानांतरण सूची में किन अधिकारियों की लॉबिंग कामयाब होती है और सरकार इस 'मलाईदार' खेल पर लगाम कसकर पारदर्शिता का क्या संदेश देती है।