औरंगाबाद सदर अस्पताल में होता है सिर्फ सर्दी-जुकाम का इलाज,प्रबंधक बोले-अस्पताल में किसी भी गंभीर बीमारी के स्पेशलिस्ट डॉक्टर नहीं

जमीनी हकीकत यह है कि करोड़ों की लागत से खड़ी की गई इन इमारतों में न तो स्पेशलिस्ट डॉक्टर हैं और न ही गंभीर बीमारियों के इलाज का इंतजाम। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने घोषणा की थी कि अब रेफर का खेल 15 अगस्त से बंद हो गया है। बेवजह मरीजों को रेफर नहीं किया जाएगा, लेकिन इस बड़े अस्पताल की बदहाली से मरीजों को रेफर ना किया जाए तो डॉक्टर क्या करें। स्थानीय निवासियों का दर्द है कि सिर्फ कंक्रीट का ढांचा खड़ा कर देने से स्वास्थ्य सुविधाएं बहाल नहीं हो जातीं। अस्पताल में केवल सर्दी, खांसी और बुखार जैसी बुनियादी समस्याओं के लिए सामान्य चिकित्सक उपलब्ध हैं। 

औरंगाबाद सदर अस्पताल में होता है सिर्फ सर्दी-जुकाम का इलाज,प्रबंधक बोले-अस्पताल में किसी भी गंभीर बीमारी के स्पेशलिस्ट डॉक्टर नहीं

DESWA DESK : बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के प्रगति यात्रा के दौरान औरंगाबाद सदर अस्पताल परिसर में करोड़ों की लागत से बनी दो बहुमंजिला इमारतों का उद्घाटन बड़े जोर-शोर से किया था। मंशा यह थी कि मगध अंचल के इस बड़े जिले के मरीजों को अत्याधुनिक स्वास्थ्य सुविधाएं घर के पास ही मिल सकें। हालांकि, उद्घाटन के लंबे समय बाद भी ये आलीशान इमारत महज सफेद हाथी साबित हो रही हैं। इमारतों की भव्यता के विपरीत, अंदर का कड़वा सच यह है कि सदर अस्पताल आज भी केवल कागजों पर ही जिले का सबसे बड़ा अस्पताल बना हुआ है।  

जमीनी हकीकत यह है कि करोड़ों की लागत से खड़ी की गई इन इमारतों में न तो स्पेशलिस्ट डॉक्टर हैं और न ही गंभीर बीमारियों के इलाज का इंतजाम। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने घोषणा की थी कि अब रेफर का खेल 15 अगस्त से बंद हो गया है। बेवजह मरीजों को रेफर नहीं किया जाएगा, लेकिन इस बड़े अस्पताल की बदहाली से मरीजों को रेफर ना किया जाए तो डॉक्टर क्या करें। स्थानीय निवासियों का दर्द है कि सिर्फ कंक्रीट का ढांचा खड़ा कर देने से स्वास्थ्य सुविधाएं बहाल नहीं हो जातीं। अस्पताल में केवल सर्दी, खांसी और बुखार जैसी बुनियादी समस्याओं के लिए सामान्य चिकित्सक उपलब्ध हैं। 

हृदय रोग, न्यूरो, ऑन्कोलॉजी, गायनेकोलॉजी या ऑर्थोपेडिक जैसे गंभीर विभागों के लिए कोई विशेषज्ञ डॉक्टर पदस्थापित नहीं है। नतीजतन, दुर्घटना या किसी गंभीर बीमारी की स्थिति में मरीजों को प्राथमिक उपचार के बाद सीधे गया, पटना या वाराणसी रेफर कर दिया जाता है। इस आपाधापी में कई बार मरीज रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं।
डॉक्टरों की इस भारी किल्लत पर जब अस्पताल प्रबंधक से बात की गई तो उन्होंने भी स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी। 

प्रबंधक का कहना है कि अस्पताल में किसी भी गंभीर बीमारी के स्पेशलिस्ट डॉक्टर की तैनाती नहीं है और डॉक्टरों की भारी कमी बनी हुई है। इस संबंध में राज्य स्वास्थ्य समिति और प्रदेश स्तर पर कई बार पत्राचार कर विशेषज्ञ चिकित्सकों की मांग की गई है। वहां से जल्द ही डॉक्टरों की पदस्थापना का आश्वासन तो मिला है, लेकिन फिलहाल अस्पताल केवल बुनियादी सुविधाओं के सहारे ही चल रहा है। 

करोड़ों रुपए खर्च कर बनाई गई इमारतें खाली पड़ी धूल फांक रही हैं। जिला वासियों का कहना है कि सरकार को बड़ी इमारतें बनाने के साथ-साथ वहां डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ की बहाली पर भी उतना ही ध्यान देना चाहिए था। जब तक विशेषज्ञ चिकित्सक नहीं आते, तब तक यह बहुमंजिला सदर अस्पताल औरंगाबाद की जनता के लिए सिर्फ एक दिखावा बनकर ही रहेगा।

औरंगाबाद से दीनानाथ मौआर की रिपोर्ट