भ्रष्टाचार पर वार या औपचारिक कार्रवाई? डीटीओ केस ने उठाए सवाल
बिहार में भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई की खबरें जितनी तेज़ी से आती हैं, उतनी ही तेजी से एक बड़ा सवाल भी खड़ा कर जाती हैं—आख़िर ....
बिहार में भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई की खबरें जितनी तेज़ी से आती हैं, उतनी ही तेजी से एक बड़ा सवाल भी खड़ा कर जाती हैं—आख़िर ये सब बार-बार हो क्यों रहा है? इसी कड़ी में एक मामला सामने आया है जो प्रशासनिक सेवा के अधिकारी और मुजफ्फरपुर के तत्कालीन डीटीओ रजनीश लाल से जुड़ा है, जिनके खिलाफ निगरानी ब्यूरो की कार्रवाई ने एक बार फिर सिस्टम की परतें खोल दी हैं।
यह मामला नया नहीं
बताया जा रहा है छापेमारी के दौरान उनके ठिकानों से करीब 50 लाख रुपये नकद बरामद हुए। ये ऐसी रकम है , जो सरकारी वेतन की परिभाषा से कहीं आगे निकल जाती है। इतना ही नहीं, जांच में लगभग 78.97 लाख रुपये की अवैध संपत्ति का खुलासा हुआ, जिसे वे वैध साबित नहीं कर सके। बता दें कि यह मामला नया नहीं है। 22 जून 2021 को केस दर्ज हुआ, 9 जुलाई 2021 से निलंबन हुआ, और अब जाकर विभागीय जांच में आरोप सही पाए गए।
सख्त दंडात्मक कार्रवाई का फैसला
लेकिन असली सवाल यही है। क्या कार्रवाई सिर्फ “घटना के बाद” ही होगी? सिस्टम में रहते हुए ऐसे अधिकारी वर्षों तक कैसे फलते-फूलते रहते हैं? क्या निगरानी तंत्र केवल शिकायत आने का इंतज़ार करता है, या फिर कहीं न कहीं आंखें मूंद लेने की आदत बन चुकी है?सरकार ने इस मामले में सख्त दंडात्मक कार्रवाई का फैसला जरूर लिया है, जो कागज़ पर सख्ती दिखाता है लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है कि हर कुछ महीनों में ऐसे मामलों का सामने आना इस बात का संकेत है कि समस्या किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरे तंत्र की है।
क्या यह डर भी पैदा करती है?
दरअसल यह कार्रवाई एक संदेश तो देती है लेकिन सवाल यह है कि क्या यह डर भी पैदा करती है? या फिर यह सिर्फ “एक और केस” बनकर रह जाएगी? जब तक जवाबदेही सिर्फ कार्रवाई तक सीमित रहेगी और रोकथाम पर गंभीरता नहीं दिखाई जाएगी, तब तक ऐसे मामले खबर बनते रहेंगे… और सिस्टम सवालों के घेरे में खड़ा रहेगा।जरूरत सिर्फ सख्त सजा की नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाने की है जहां भ्रष्टाचार पनप ही न सके। वरना हर कार्रवाई के बाद वही सवाल फिर उठेगा आखिर सिस्टम कब बदलेगा?













