वर्दी का दर्द या जनता का गुस्सा?,गिरती छवि और भरोसे का संकट,क्या पुलिस-जनता के रिश्ते में आ गया है दरार?
कभी वर्दी भरोसे और सुरक्षा की पहचान मानी जाती थी लेकिन जब वहीं वर्दी सवालों के घेरे में आ जाए तो सिर्फ सिस्टम हीं नहीं, समाज की संवेदनाएं भी प्रभावित होने लगती हैं। संत कबीर की पंक्ति अपने दिल से जानिए, पराए दिल का हाल ...,आज के दौर में एक गहरी सीख देती है मगर हकीकत यह है कि संवेदना और विश्वास के बीच की दूरी ....
कभी वर्दी भरोसे और सुरक्षा की पहचान मानी जाती थी लेकिन जब वहीं वर्दी सवालों के घेरे में आ जाए तो सिर्फ सिस्टम हीं नहीं, समाज की संवेदनाएं भी प्रभावित होने लगती हैं। संत कबीर की पंक्ति अपने दिल से जानिए, पराए दिल का हाल ...,आज के दौर में एक गहरी सीख देती है मगर हकीकत यह है कि संवेदना और विश्वास के बीच की दूरी बढ़ती जा रही है।
वर्दी सवालों के घेरे में
बिहार में इन दिनों कुछ ऐसी ही तस्वीर उभर रही है, जहां वर्दी सवालों के घेरे में है और जनता का भरोसा धीरे-धीरे डगमगाता दिख रहा है।बिहार में हाल के दिनों में दरोगाओं के साथ हुई घटनाओं ने एक गंभीर बहस को जन्म दिया है। अरवल में 2020 बैच के एक दरोगा की सड़क हादसे में मौत, शिवहर के फतेहपुर के पास एक अन्य दरोगा का गंभीर रूप से घायल होना और इससे पहले बांका में गश्ती के दौरान एक एसआई विकास कुमार की ट्रक से कुचलकर मौत—ये घटनाएं पुलिस महकमे के लिए बेहद दुखद हैं लेकिन इन हादसों के बाद समाज के एक हिस्से में अपेक्षित सहानुभूति की कमी भी साफ नजर आती है। कहीं चुप्पी है, तो कहीं एक अजीब-सी उदासीनता।
वर्षों से चुपचाप बेहद खामोशी से झेलते आए
दरअसल इस दूरी की जड़ें केवल इन हादसों में नहीं, बल्कि उन अनुभवों में हैं जो आम लोग वर्षों से चुपचाप बेहद खामोशी से झेलते आए हैं। जब बलिया थाना के दरोगा विकास कुमार राय जैसे अधिकारी खुल्लम खुल्ला भ्रष्टाचार, अवैध वसूली और कानून का दुरुपयोग कर रहा है और पीड़ित न्याय के लिए दर-दर भटकता है तब वर्दी के प्रति सम्मान धीरे-धीरे आक्रोश में बदलने लगता है। ऐसे मामलों में कार्रवाई की कमी या देरी भी इस अविश्वास को और गहरा कर देती है। नतीजा यह होता है कि जब कोई वर्दीधारी खुद पीड़ा का शिकार होता है, तो समाज का एक वर्ग भावनात्मक रूप से उससे जुड़ नहीं पाता।
कानून से ऊपर कोई नहीं
दक्षिण भारत में चर्चित सथानकुलम कस्टोडियल किलिंग केस इसका बड़ा उदाहरण है, जहां लंबी कानूनी लड़ाई के बाद अदालत ने दोषी पुलिसकर्मियों को कड़ी सजा सुनाई। इस फैसले ने यह संदेश जरूर दिया कि कानून से ऊपर कोई नहीं है चाहे वह वर्दी में ही क्यों न हो। वहीं इस केस में एक और बात सामने आई जो जनता और प्रशासन के बीच बढ़ती खाई को भी दिखाती है। कोर्ट के इस फैसले का कई लोगों ने स्वागत किया। उन नौ पुलिसवालों के लिए समाज के एक हिस्से में अपेक्षित सहानुभूति की कमी साफ साफ नजर आई।
पूरी व्यवस्था को कठघरे में खड़ा करना उचित नहीं
वहीं यह भी समझना जरूरी है कि कुछ व्यक्तियों के आचरण से पूरी व्यवस्था को कठघरे में खड़ा करना उचित नहीं है। आज भी कई ऐसे ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी हैं जो अपनी जान जोखिम में डालकर समाज की सुरक्षा में जुटे रहते हैं लेकिन कुछ लोगों के गलत आचरण का असर पूरे सिस्टम की छवि पर पड़ता है और जनता का भरोसा कमजोर पड़ता है। परिणाम यह होता है कि जब किसी वर्दीधारी के साथ हादसा होता है, तो समाज का एक वर्ग संवेदना खो देता है और यही सबसे खतरनाक स्थिति है।













