बिहार में महिलाओं के सशक्तीकरण की नई पहचान: नीतीश सरकार के फैसलों ने बदली सामाजिक तस्वीर

बिहार की राजनीति में जब भी विकास और सामाजिक बदलाव की चर्चा होती है, तो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के कई फैसले मिसाल के तौर पर सामने आते हैं। खासकर महिलाओं के सशक्तीकरण और समाज के कमजोर वर्गों को आगे बढ़ाने के लिए उनकी सरकार ने कई ऐसी योजनाएं लागू कीं, जिनका असर आज राज्य के सामाजिक ढांचे में साफ दिखाई देता है। पंचायतों में....

बिहार में महिलाओं के सशक्तीकरण की नई पहचान: नीतीश सरकार के फैसलों ने बदली सामाजिक तस्वीर

बिहार की राजनीति में जब भी विकास और सामाजिक बदलाव की चर्चा होती है, तो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के कई फैसले मिसाल के तौर पर सामने आते हैं। खासकर महिलाओं के सशक्तीकरण और समाज के कमजोर वर्गों को आगे बढ़ाने के लिए उनकी सरकार ने कई ऐसी योजनाएं लागू कीं, जिनका असर आज राज्य के सामाजिक ढांचे में साफ दिखाई देता है। पंचायतों में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण, शराबबंदी और रोजगार से जुड़ी योजनाओं ने लाखों महिलाओं को नई पहचान दी है।

 महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी तेजी से बढ़ी
सबसे बड़ा और ऐतिहासिक फैसला था स्थानीय निकायों में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण देना। बिहार देश का पहला राज्य बना जिसने त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था और नगर निकायों में महिलाओं को आधी हिस्सेदारी दी। इस फैसले के बाद गांव से लेकर शहर तक महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी तेजी से बढ़ी। आज बिहार में स्थानीय निकायों में महिलाओं की भागीदारी करीब 55 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है। इस मॉडल की सफलता को देखते हुए कई अन्य राज्यों ने भी इसे अपनाया।

 2013 में बिहार पुलिस में 35 प्रतिशत महिला आरक्षण लागू 
वहीं महिलाओं को सुरक्षा व्यवस्था में भी मजबूत भूमिका देने के लिए 2013 में बिहार पुलिस में 35 प्रतिशत महिला आरक्षण लागू किया गया। इसके परिणामस्वरूप आज राज्य के पुलिस बल में लगभग 30 प्रतिशत महिलाएं शामिल हैं और महिला पुलिसकर्मियों की संख्या 31 हजार से ज्यादा हो चुकी है। इसके साथ ही 2016 से सभी सरकारी नौकरियों में भी महिलाओं के लिए 35 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण लागू किया गया। इतना ही नहीं इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेजों में भी लड़कियों के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया ।

 2006 में जीविका परियोजना की शुरुआत
वहीं ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए 2006 में जीविका परियोजना की शुरुआत की गई। स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से महिलाओं को रोजगार और स्वरोजगार से जोड़ा गया। आज राज्य में 1 करोड़ 40 लाख से अधिक महिलाएं ‘जीविका दीदी’ के रूप में काम कर रही हैं और 11 लाख से ज्यादा स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी हैं। इस मॉडल की सफलता के बाद केंद्र सरकार ने देशभर में  राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन लागू किया।इतना हीं नहीं  महिलाओं को आर्थिक सहायता देने के उद्देश्य से 2025 में  मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना शुरू की गई। इस योजना के तहत करीब 1.81 करोड़ महिलाओं के बैंक खातों में 10-10 हजार रुपये भेजे गए हैं। वहीं अपना व्यवसाय शुरू करने या बढ़ाने के लिए महिलाओं को दो लाख रुपये तक की अतिरिक्त सहायता देने की व्यवस्था भी की गई है।

 2009-10 में अक्षर अंचल योजना शुरूआत 
वहीं महिलाओं की शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए 2009-10 में अक्षर अंचल योजना शुरू की गई। इस अभियान के जरिए 67 लाख से ज्यादा महिलाओं को साक्षर बनाया गया। बाद में महादलित, अल्पसंख्यक और अति पिछड़ा वर्ग की महिलाओं को भी इस अभियान से जोड़ा गया।स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में सुधार के लिए कन्या उत्थान योजना की शुरुआत की गई। इस योजना के कारण जन्म पंजीकरण की दर में उल्लेखनीय वृद्धि हुई और अस्पतालों में प्रसव कराने वाली महिलाओं की संख्या भी तेजी से बढ़ी। इसमें जननी बाल सुरक्षा योजना  का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा।

बिहार में पूर्ण शराबबंदी लागू की गई
सामाजिक सुधार के क्षेत्र में भी सरकार ने बड़ा कदम उठाया। अप्रैल 2016 में बिहार में पूर्ण शराबबंदी लागू की गई और 2 अक्टूबर 2016 को नया मद्य निषेध कानून लागू हुआ। सरकार का दावा है कि इस फैसले से घरेलू हिंसा में 35 से 40 प्रतिशत तक कमी आई और परिवारों की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ। खासकर ग्रामीण इलाकों की महिलाओं ने इस फैसले का खुलकर समर्थन किया।इसके अलावा 2017 में बाल विवाह और दहेज प्रथा के खिलाफ राज्यव्यापी अभियान चलाया गया, जिसमें करीब ढाई करोड़ लोगों ने इन सामाजिक कुरीतियों को खत्म करने की शपथ ली। महिलाओं की सुरक्षा के लिए महिला हेल्पलाइन भी शुरू की गई, जो राज्य के सभी 38 जिलों में घरेलू हिंसा और यौन उत्पीड़न से पीड़ित महिलाओं को कानूनी और मनोवैज्ञानिक सहायता प्रदान करती है।कुल मिलाकर, इन योजनाओं और फैसलों ने बिहार में महिलाओं की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक भागीदारी को नई दिशा दी है। यही वजह है कि आज बिहार महिलाओं के सशक्तीकरण के कई मॉडल पूरे देश के लिए उदाहरण बन चुके हैं।