खाकी पर लगे दाग… या पूरे सिस्टम की सच्चाई? किशनगंज में EOU का बड़ा एक्शन: टाउन थाना प्रभारी के ठिकानों पर छापेमारी
कहते हैं कानून-व्यवस्था किसी भी राज्य की रीढ़ होती है… लेकिन जब यही रीढ़ भीतर से खोखली होने लगे, तो सवाल सिर्फ एक अधिकारी पर नहीं, पूरे सिस्टम पर खड़ा होता है।14 अप्रैल 2026 की सुबह बिहार में एक बार फिर खाकी वर्दी सवालों के घेरे में आ गई। आर्थिक अपराध इकाई (EOU) की छापेमारी में किशनगंज नगर थाना के प्रभारी अभिषेक कुमार रंजन के ठिकानों से आय से अधिक संपत्ति के जो संकेत मिले, वो चौंकाने वाले ही नहीं, बल्कि ....
कहते हैं कानून-व्यवस्था किसी भी राज्य की रीढ़ होती है… लेकिन जब यही रीढ़ भीतर से खोखली होने लगे, तो सवाल सिर्फ एक अधिकारी पर नहीं, पूरे सिस्टम पर खड़ा होता है।14 अप्रैल 2026 की सुबह बिहार में एक बार फिर खाकी वर्दी सवालों के घेरे में आ गई। आर्थिक अपराध इकाई (EOU) की छापेमारी में किशनगंज नगर थाना के प्रभारी अभिषेक कुमार रंजन के ठिकानों से आय से अधिक संपत्ति के जो संकेत मिले, वो चौंकाने वाले ही नहीं, बल्कि सिस्टम की परतें उधेड़ने वाले हैं। सुबह-सुबह पटना, छपरा और किशनगंज समेत कई ठिकानों पर एक साथ चली कार्रवाई में 1.70 करोड़ रुपये से अधिक की अवैध संपत्ति के संकेत मिले हैं। एक साथ चली इस कार्रवाई ने साफ कर दिया कि कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं है बल्की यह पूरे सिस्टम की परतें खोलने वाली सच्चाई है और यह कोई पहला मामला नहीं है।
करीब 80 करोड़ की संदिग्ध संपत्ति का खुलासा
बता दें कि महज 15 दिनों के भीतर किशनगंज में ही पूर्व एसडीपीओ गौतम कुमार के खिलाफ कार्रवाई में करीब 80 करोड़ की संदिग्ध संपत्ति का खुलासा… और अब 1.70 करोड़ से ज्यादा के अवैध संपत्ति के संकेत—ये आंकड़े इशारा करते हैं कि भ्रष्टाचार अब अपवाद नहीं, बल्कि प्रक्रिया बन चुका है। अब सवाल सीधा है। 2009 में एक साधारण सब-इंस्पेक्टर के तौर पर नौकरी शुरू करने वाला अधिकारी आखिर कुछ ही वर्षों में करोड़ों का मालिक कैसे बन जाता है? क्या ये सिर्फ व्यक्तिगत लालच है… या फिर ये एक ऐसा संगठित नेटवर्क है, जहां हर स्तर पर हिस्सेदारी तय है?
क्या सिस्टम सच में साफ है
पुलिस थाना जहां आम आदमी न्याय की उम्मीद लेकर जाता है अगर वहीं रेट कार्ड तय होने लगे, तो फिर FIR भी एक सेवा नहीं, बल्कि ‘सौदा’ बन जाती है। जहां शिकायत दर्ज कराने से पहले जेब टटोली जाए, वहां न्याय नहीं, सिर्फ व्यवस्था का मजाक होता है। बिहार में “सुशासन” का दावा बार-बार दोहराया जाता है… लेकिन सवाल ये है कि अगर सब कुछ इतना ही व्यवस्थित है, तो फिर हर कुछ दिनों में भ्रष्टाचार की नई परत क्यों खुलती है? क्या सिस्टम सच में साफ है… या सिर्फ ऊपर से पॉलिश किया गया है? सबसे बड़ी विडंबना ये है कि ऐसे मामले तब सामने आते हैं, जब कोई एजेंसी छापा मारती है। यानी रोजमर्रा की निगरानी या तो कमजोर है… या जानबूझकर आंखें बंद रखी जाती हैं। अब वक्त सिर्फ कार्रवाई का नहीं… बल्कि बदलाव का है।
पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने की जरूरत
जरूरत है भर्ती से लेकर पोस्टिंग तक पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने की, अंदरूनी निगरानी को मजबूत करने की और सबसे जरूरी दोषियों को त्वरित और सख्त सजा देने की क्योंकि जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं…तो लोकतंत्र सिर्फ खतरे में नहीं पड़ता बल्कि भरोसा ही खत्म हो जाता है। सिस्टम तब नहीं बदलता जब घोटाले सामने आते हैं,सिस्टम तब बदलता है जब घोटाले करना ‘नामुमकिन’ हो जाए।













