300 करोड़ का ISBT या बदहाली का महल? टूटे लिफ्ट.. गंदे शौचालय..हर तरफ कूड़ा!,क्या यही है आधुनिक बिहार की तस्वीर

राजधानी पटना में विश्वस्तरीय परिवहन सुविधा देने के बड़े दावों के साथ तैयार किया गया ISBT (इंटर स्टेट बस टर्मिनल) आज अपनी बदहाल स्थिति को लेकर सवालों के घेरे में है। करीब 300 करोड़ रुपये की लागत से बना यह टर्मिनल अब भ्रष्टाचार, लापरवाही और सिस्टम की खामियों का जीता-जागता उदाहरण बनता जा रहा है। ISBT की मौजूदा हालत देखकर यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं कि यहां रखरखाव और...

300 करोड़ का ISBT या बदहाली का महल? टूटे लिफ्ट.. गंदे शौचालय..हर तरफ कूड़ा!,क्या यही है आधुनिक बिहार की तस्वीर

राजधानी पटना में विश्वस्तरीय परिवहन सुविधा देने के बड़े दावों के साथ तैयार किया गया ISBT (इंटर स्टेट बस टर्मिनल) आज अपनी बदहाल स्थिति को लेकर सवालों के घेरे में है। करीब 300 करोड़ रुपये की लागत से बना यह टर्मिनल अब भ्रष्टाचार, लापरवाही और सिस्टम की खामियों का जीता-जागता उदाहरण बनता जा रहा है। ISBT की मौजूदा हालत देखकर यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं कि यहां रखरखाव और निगरानी पूरी तरह से फेल हो चुकी है। 

सिस्टम की नाकामी का सबसे बड़ा सबूत 
जिस टर्मिनल को आधुनिक बिहार की पहचान बनना था, आज वही सिस्टम की नाकामी का सबसे बड़ा सबूत बन गया है।करीब 300 करोड़ रुपये की लागत से तैयार हुआ ये भव्य बस टर्मिनल—जिसे बिहार का पहला अत्याधुनिक ISBT कहा गया—आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। जहां यात्रियों को विश्वस्तरीय सुविधाएं मिलनी थीं, वहां अब टूटे हुए लिफ्ट के गेट, बदबू मारते शौचालय और चारों तरफ फैला कचरा उनका स्वागत कर रहा है।टर्मिनल के अंदर की तस्वीरें किसी आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर की नहीं, बल्कि एक उपेक्षित खंडहर की कहानी बयां करती हैं।

 बुजुर्गों और महिलाओं को भारी परेशानियों का सामना
यात्रियों के लिए लगाई गई लिफ्ट लंबे समय से खराब पड़ी है, जिस पर अबतक सिस्टम कि नजर नहीं पड़ी या ये कहें कि इसे देखकर भी अनदेखा किया जा रहा है।  लंबे समय से खराब पड़ी लिफ्ट के वजह से बुजुर्गों और महिलाओं को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।वहीं, शौचालयों की स्थिति इतनी खराब है कि वहां जाना भी मुश्किल हो गया है। गंदगी, बदबू और साफ-सफाई की कमी साफ तौर पर प्रशासनिक उदासीनता को दर्शाती है।टर्मिनल परिसर में सफाई व्यवस्था पूरी तरह चरमराई,जगह-जगह कूड़े का अंबार। 

इस बदहाली का  आखिर जिम्मेदार कौन है? 
यह सब देखने के बाद अब  सवाल उठने भी लाजमी हैं कि जब इतनी बड़ी रकम खर्च करने के बावजूद बुनियादी सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं, तो इस बदहाली का  आखिर जिम्मेदार कौन है? क्या निर्माण के बाद रखरखाव की कोई ठोस व्यवस्था नहीं बनाई गई थी, या फिर यह पूरा मामला केवल कागजों तक सीमित रह गया? सवाल ये भी है कि क्या विकास सिर्फ उद्घाटन और फोटो तक सीमित रह गया है? क्या आम जनता का पैसा सिर्फ दिखावे के लिए खर्च हो रहा है?पटना का ये “विश्वस्तरीय” बस टर्मिनल आज नींद से बेसुध हो चुकी  सिस्टम की पोल खोल रहा है। जनता टैक्स देती है, नेता फीता काटते हैं… लेकिन उसके बाद सिस्टम गहरी नींद में चला जाता है। अब सवाल सिर्फ एक इमारत का नहीं, पूरे सिस्टम की सोच का है—क्या बिहार को सच में विकास चाहिए, या सिर्फ उसका दिखावा? आखिर नींद से बेसुध सिस्टम को जनता की तकलीफ कब दिखाई देगी?

दिखावे का चश्मा 
फिलहाल जिम्मेदारों की तरफ से कोई जवाब नहीं,क्योंकि उन्होंने विकास के नाम पर जो दिखावे का चश्मा पहना है उससे यह सच नहीं दिखता लेकिन “विश्वस्तरीय” सुविधा की सच्चाई सबके सामने है। बता दें कि ISBT की यह बदहाली सिर्फ एक इमारत की कहानी नहीं है, बल्कि यह हमारे सिस्टम की कमजोरियों और जवाबदेही की कमी को उजागर करती है।