ममता के सबसे करीबी से भाजपा के सबसे बड़े चेहरे तक, जानिए शुभेंदु अधिकारी की कहानी

पश्चिम बंगाल की राजनीति में शुक्रवार का दिन ऐतिहासिक साबित हुआ। केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah ने भाजपा विधायक दल की बैठक में Suvendu Adhikari को नेता चुने जाने का ऐलान किया। इसके साथ ही बंगाल में एक नए राजनीतिक अध्....

ममता के सबसे करीबी से भाजपा के सबसे बड़े चेहरे तक, जानिए शुभेंदु अधिकारी की कहानी

पश्चिम बंगाल की राजनीति में शुक्रवार का दिन ऐतिहासिक साबित हुआ। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भाजपा विधायक दल की बैठक में शुभेंदु अधिकारी को नेता चुने जाने का ऐलान किया। इसके साथ ही बंगाल में एक नए राजनीतिक अध्याय की औपचारिक शुरुआत हो गई। शनिवार ९ मई को शुभेंदु अधिकारी पश्चिम बंगाल के नौवें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेंगे।

बता दें कि कभी ममता बनर्जी के सबसे करीबी सहयोगी माने जाने वाले शुभेंदु आज भाजपा के सबसे बड़े बंगाली चेहरे बन चुके हैं। छात्र राजनीति से शुरू हुआ उनका सफर अब राज्य के सर्वोच्च पद तक पहुंच चुका है।

दो बड़ी जीतों ने बनाया सबसे मजबूत दावेदार

शुभेंदु अधिकारी की राजनीतिक स्वीकार्यता को सबसे ज्यादा मजबूती दो चुनावी जीतों से मिली।

नंदीग्राम का संग्राम (2021)

शुभेंदु अधिकारी ने पहली बार ममता बनर्जी को उनके मजबूत गढ़ नंदीग्राम में हराकर पूरे देश को चौंका दिया था। इस जीत ने उन्हें भाजपा का सबसे बड़ा बंगाली चेहरा बना दिया।

भवानीपुर की निर्णायक जीत (2026)

2026 में शुभेंदु ने भवानीपुर सीट पर ममता बनर्जी को हराकर यह संदेश दिया कि बंगाल की राजनीति बदलाव की ओर बढ़ चुकी है। इस जीत के बाद मुख्यमंत्री पद के लिए उनकी दावेदारी लगभग तय मानी जाने लगी थी।

बंगाल की मिट्टी से जुड़ी पहचान

जानकारी के लिए बता दें कि 15 दिसंबर 1970 को पूर्व मेदिनीपुर जिले के कारकुली गांव में जन्मे शुभेंदु अधिकारी वरिष्ठ नेता शिशिर अधिकारी के पुत्र हैं। उनकी शुरुआती पढ़ाई कोंटाई में हुई और बाद में उन्होंने Rabindraरवींद्र भारती विश्वविद्यालय से इतिहास में एमए किया।

कम लोग जानते हैं कि अपने शुरुआती दिनों में शुभेंदु ने RSS की शाखाओं में प्रशिक्षण भी लिया था। इसी दौरान उनके भीतर संगठनात्मक क्षमता और राजनीतिक अनुशासन विकसित हुआ।

छात्र राजनीति से शुरू हुआ सफर

शुभेंदु अधिकारी ने 1980 के दशक में कांग्रेस के छात्र संगठन से राजनीति की शुरुआत की थी। वर्ष 1995 में वे पहली बार पार्षद बने। हालांकि 2007 का नंदीग्राम आंदोलन उनके राजनीतिक जीवन का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। इसी आंदोलन ने उन्हें राज्य स्तर का बड़ा नेता बना दिया।कभी टीएमसी में ममता बनर्जी के संभावित उत्तराधिकारी माने जाने वाले शुभेंदु का मोहभंग धीरे-धीरे शुरू हुआ। राजनीतिक गलियारों में माना जाता है कि पार्टी में अभिषेक बनर्जी की बढ़ती भूमिका से शुभेंदु खुद को असहज महसूस करने लगे थे।

विपक्ष के नेता के रूप में आक्रामक राजनीति

बता दें कि ममता सरकार में परिवहन और पर्यावरण मंत्री रहने के बाद उन्होंने 2020 के अंत में टीएमसी छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया। भाजपा में आने के बाद उन्होंने खुद को हिंदुत्व और बंगाली अस्मिता के मजबूत चेहरे के रूप में स्थापित किया।विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रहते हुए शुभेंदु अधिकारी लगातार ममता सरकार पर हमलावर रहे। SSC भर्ती घोटाला, संदेशखाली विवाद और आरजी कर अस्पताल मामले जैसे मुद्दों पर उन्होंने सड़क से सदन तक आंदोलन किया। सरकार को घेरने के कारण उन्हें कई बार विधानसभा से निलंबन का सामना भी करना पड़ा।

भाजपा की रणनीति में फिट बैठता चेहरा

भाजपा लंबे समय से बंगाल में ऐसे स्थानीय चेहरे की तलाश में थी, जो बंगाल की संस्कृति, भाषा और जमीनी राजनीति को गहराई से समझता हो। शुभेंदु अधिकारी इस रणनीति पर पूरी तरह फिट बैठे। बंगाल में जन्म, बांग्ला संस्कृति से गहरा जुड़ाव और मजबूत जनाधार ने उन्हें भाजपा का स्वाभाविक मुख्यमंत्री चेहरा बना दिया।

शनिवार को जब शुभेंदु अधिकारी मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे, तब यह सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं होगा, बल्कि बंगाल की राजनीति में एक बड़े बदलाव का प्रतीक भी माना जाएगा।