पटना हाईकोर्ट का सख्त रुख: जमुई पुलिस पर बड़ा एक्शन! SP-SDPO और SHO पर विभागीय कार्रवाई का आदेश

बिहार में मनमानी गिरफ्तारी के मामलों पर अब सख्ती शुरू हो गई है। पटना हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में साफ कर दिया है कि कानून से ऊपर कोई नहीं चाहे वह पुलिस ही क्यों न हो। न्यायमूर्ति अरूण कुमार झा की एकल पीठ ने जमुई जिले के पुलिस अधीक्षक (SP), एसडीपीओ (SDPO) और तत्कालीन थाना अध्यक्ष (SHO) के खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू करने का आदेश बिहार के पुलिस महानिदेशक (.....

पटना हाईकोर्ट का सख्त रुख: जमुई पुलिस पर बड़ा एक्शन! SP-SDPO और SHO पर विभागीय कार्रवाई का आदेश


बिहार में मनमानी गिरफ्तारी के मामलों पर अब सख्ती शुरू हो गई है। पटना हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में साफ कर दिया है कि कानून से ऊपर कोई नहीं चाहे वह पुलिस ही क्यों न हो। न्यायमूर्ति अरूण कुमार झा की एकल पीठ ने जमुई जिले के पुलिस अधीक्षक (SP), एसडीपीओ (SDPO) और तत्कालीन थाना अध्यक्ष (SHO) के खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू करने का आदेश बिहार के पुलिस महानिदेशक (DGP) को दिया है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जब तक जांच पूरी नहीं होती, तब तक संबंधित SHO को किसी भी केस की जांच की जिम्मेदारी नहीं दी जाएगी।

सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की खुली अवहेलना
हाईकोर्ट ने इस मामले में तत्कालीन जांच अधिकारी और SHO को अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 2 के तहत सिविल अवमानना का दोषी मानते हुए कारण बताओ नोटिस जारी किया है। उन्हें आठ सप्ताह के भीतर जवाब देने का निर्देश दिया गया है।दरअसल,  सुप्रीम कोर्ट  ने अर्निश कुमार बनाम बिहार राज्य  केस में साफ गाइडलाइन दी थी कि 7 साल से कम सजा वाले मामलों में सीधे गिरफ्तारी नहीं की जा सकती। ऐसे मामलों में पहले CRPC की धारा 41-A के तहत नोटिस देना अनिवार्य है लेकिन जमुई पुलिस ने इन दिशा-निर्देशों को नजरअंदाज किया, जिसे हाईकोर्ट ने न्यायपालिका के आदेशों का सीधा उल्लंघन माना।

क्या है पूरा मामला?
बता दें कि यह मामला 20 जुलाई 2020 को जमुई थाना में दर्ज FIR संख्या 379/2020 से जुड़ा है। आरोप है कि कुमार दुष्यंत नामक व्यक्ति ने फेसबुक अकाउंट हैक कर आपत्तिजनक संदेश पोस्ट किए। इस केस में IPC की धारा 420 और IT एक्ट की धारा 66(C)(D) लगाई गई।हालांकि, याचिकाकर्ता का कहना है कि मामले को गंभीर बनाने के लिए धारा 420 को गलत तरीके से जोड़ा गया। उन्होंने आरोप लगाया कि जांच अधिकारी से मिलने पर उन्हें बताया गया कि वरिष्ठ अधिकारियों के दबाव में उनकी गिरफ्तारी तय है और बाद में उन्हें अवैध रूप से हिरासत में ले लिया गया।

गिरफ्तारी का तरीका बना विवाद की वजह
याचिकाकर्ता के अनुसार, 20 नवंबर 2020 को जब वे एक सेमिनार से लौट रहे थे, तब सादे कपड़ों में आए पुलिसकर्मियों ने उन्हें रास्ते में रोक लिया, मोबाइल छीन लिया और सीधे थाने ले गए।आरोप है कि थाने में उनके साथ अभद्र व्यवहार किया गया, यहां तक कि उनके पिता को भी झूठे केस में फंसाने की धमकी दी गई। सबसे गंभीर बात यह रही कि उन्हें हथकड़ी लगाकर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) के सामने पेश किया गया।कोर्ट ने इस पूरी कार्रवाई को “दुर्भावनापूर्ण” और “यांत्रिक गिरफ्तारी” करार देते हुए कहा कि यह सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवहेलना है।

सरकारी पक्ष की दलील खारिज
सुनवाई के दौरान सरकारी पक्ष ने गिरफ्तारी को सही ठहराने की कोशिश की, लेकिन हाईकोर्ट ने इसे पूरी तरह खारिज कर दिया। कोर्ट ने साफ कहा कि पुलिस अधिकारियों ने कानून और सर्वोच्च अदालत के निर्देशों की अनदेखी की है।इस मामले की अगली सुनवाई 19 जून 2026 को निर्धारित की गई है। तब तक संबंधित SHO को किसी भी जांच कार्य से दूर रखा जाएगा।इस सख्त आदेश के बाद बिहार पुलिस महकमे में हलचल तेज हो गई है और यह फैसला आने वाले समय में गिरफ्तारी की प्रक्रिया पर बड़ा असर डाल सकता है।