देश के लाखों कमर्शियल ड्राइवरों की कमाई पर ‘अनदेखा टैक्स’, सवालों के घेरे में व्यवस्था

कहते हैं देश की अर्थव्यवस्था सड़कों पर दौड़ती है , लेकिन सच्चाई यह है कि सड़कों पर सिर्फ ट्रक ही नहीं सिस्टम का कलेक्शन भी दौड़ता है।  देश की सड़कों पर दिन-रात दौड़ते लाखों कमर्शियल ड्राइवर हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं लेकिन इनकी जिंदगी का एक ऐसा पहलू है, जिस पर बहुत कम बात होती है। वह  ये है कि एक विश्वसनीय सर्वे के अनुसार, भारत में हर साल ड्राइवरों से करीब ₹50,000 करोड़ से ₹60,000 करोड़ तक ....

देश के लाखों कमर्शियल ड्राइवरों की कमाई पर ‘अनदेखा टैक्स’, सवालों के घेरे में व्यवस्था

कहते हैं देश की अर्थव्यवस्था सड़कों पर दौड़ती है , लेकिन सच्चाई यह है कि सड़कों पर सिर्फ ट्रक ही नहीं सिस्टम का कलेक्शन भी दौड़ता है।  देश की सड़कों पर दिन-रात दौड़ते लाखों कमर्शियल ड्राइवर हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं लेकिन इनकी जिंदगी का एक ऐसा पहलू है, जिस पर बहुत कम बात होती है। वह  ये है कि एक विश्वसनीय सर्वे के अनुसार, भारत में हर साल ड्राइवरों से करीब ₹50,000 करोड़ से ₹60,000 करोड़ तक की अवैध वसूली या रिश्वत ली जाती है। यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि लाखों परिवारों की छीनी हुई खुशियों का हिसाब है।

हकीकत इससे बिल्कुल उलट है
अब ज़रा सोचिए अगर यही पैसा ईमानदारी से हर ड्राइवर में बराबर बांट दिया जाए, तो हर एक के हिस्से में सालाना करीब ₹50,000 से ₹60,000 आ सकते हैं। ये रकम छोटी नहीं है । इससे ड्राइवर अपने बच्चों को अच्छे स्कूल में पढ़ा सकते हैं, घर की हालत सुधार सकते हैं, और परिवार को एक बेहतर और सुरक्षित जीवन दे सकते हैं। कई परिवारों के लिए यह रकम उनकी पूरी जिंदगी बदल सकती है लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल उलट है। ड्राइवर, सड़क पर पसीना बहाता है , जोखिम उठाता है , जिम्मेदारी निभाता है … लेकिन उसकी मेहनत की कमाई का एक बड़ा हिस्सा सिस्टम की खामियों में खो जाता है।  अजीब बात है , सड़क पर गाड़ी चलाने के लिए लाइसेंस चाहिए लेकिन  वसूली  करने के लिए सिर्फ एक कुर्सी काफी है। बता दें कि यह सिर्फ आर्थिक नुकसान नहीं, बल्कि एक सामाजिक अन्याय भी है। 

सिस्टम में सबसे महंगी चीज डीज़ल...
दरअसल सवाल ये नहीं कि ड्राइवर कितना कमाता है। बड़ा सवाल ये है कि वो कितना बचा पाता है, शायद इस सिस्टम में सबसे महंगी चीज डीज़ल नहीं, बल्कि  ईमानदारी हो चुकी है ।ड्राइवर  अपने साथ एक ऐसा सच  ढो रहा है,जिसे हर कोई जानता है… लेकिन बोलता कोई नहीं। अब सवाल यह है कि क्या ये व्यवस्था बदलेगी, या फिर सिस्टम ऐसे ही पेट भरता रहेगा? क्या मेहनत करने वालों को उनका पूरा हक नहीं मिलना चाहिए?  बता दें कि जब तक पारदर्शिता, सख्त कानून और जवाबदेही सुनिश्चित नहीं होगी, तब तक यह सिलसिला रुकना मुश्किल है।समय आ गया है कि इस मुद्दे पर गंभीरता से सोचें।